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दुःख की दुनिया भीतर है

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मैं जब होशमंद हुआ, तब जाना कि पिता गुम्मा आदमी हैं। लेकिन माँ बताती है कि पहले वह ऐसे नहीं थे। मेरे बाल मन पर भी पिता की भिन्न छवियाँ दर्ज हैं —मज़दूरों के हक़ में खड़े रहने वाले, रिश्तेदारों के घर होने वाली शादियों में काम करने वाले, तोते, खरगोश और बकरियों में रुचि लेते, बाज़ार से भाजी के झोले उठा कर लाते, बैठक में खैनी बनाते और नहीं तो किसी को पीटते पिता! ऐसे आदमी के लिए बाद में चुप होते जाना और अपनी काया में सिमट कर जीना दुष्कर रहा होगा। — इसी पुस्तक से।

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Description

मैं जब होशमंद हुआ, तब जाना कि पिता गुम्मा आदमी हैं। लेकिन माँ बताती है कि पहले वह ऐसे नहीं थे। मेरे बाल मन पर भी पिता की भिन्न छवियाँ दर्ज हैं —मज़दूरों के हक़ में खड़े रहने वाले, रिश्तेदारों के घर होने वाली शादियों में काम करने वाले, तोते, खरगोश और बकरियों में रुचि लेते, बाज़ार से भाजी के झोले उठा कर लाते, बैठक में खैनी बनाते और नहीं तो किसी को पीटते पिता! ऐसे आदमी के लिए बाद में चुप होते जाना और अपनी काया में सिमट कर जीना दुष्कर रहा होगा। — इसी पुस्तक से।

Additional information

Author

जे सुशील / Jey Sushil

Cover Type

Paperback

ISBN

9788194312390

Language

Hindi