Description
जो दुनिया बहुत सारे कोलाहल से भरी है, लगभग हर पल एकांत और स्मृति का अतिक्रमण करते सूचना-संजाल की मारी है, बहुत स्थूल और क्षणजीवी भावुकता की अभ्यस्त हो चली है, उसमें बाबुषा एक लगभग असम्भव लगता संवाद खोज लाती हैं- दो ऐसे लोगों के बीच, जो एक-दूसरे के लिए लम्बे समय तक अदृश्य रहे हैं, फ़ोन नहीं तक करते, ईमेल नहीं करते, आपस में मिलने का प्रयास भी नहीं करते— बस चिट्ठियाँ लिखते हैं।






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